April 17, 2026 |

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Amarwara Bypolls Result Analysis : भाजपा ने 16 साल बाद जीता अमरवाड़ा चुनाव, आखिरी राउंड में बीजेपी ने मारी बाजी

Amarwara Bypolls Result Analysis: कांग्रेस प्रत्याशी धीरन शाह ने भाजपा प्रत्याशी कमलेश शाह को कड़ी टक्कर दी, लेकिन आखिरी के तीन चरण में 3027 वोटों से पिछड़ गए।

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Amarwara Bypolls Result Analysis : मध्य प्रदेश में भाजपा ने डेढ़ महीने के अंदर कांग्रेस को दूसरा बड़ा झटका दिया है। लोकसभा चुनाव में क्लीनस्वीप करने के बाद अमरवाड़ा उपचुनाव भी जीत लिया। कांग्रेस प्रत्याशी धीरन शाह ने भाजपा प्रत्याशी कमलेश शाह को कड़ी टक्कर दी, लेकिन आखिरी के तीन चरण में 3027 वोटों से पिछड़ गए।

 

अमरवाड़ा उपचुनाव में भाजपा-कांग्रेस के बीच कड़ी टक्कर को देखने को मिली। पहले तीन चरण में भाजपा को जबरदस्त बढ़त मिली, लेकिन चौथे राउंड में भाजपा पिछड़ी तो 17वें राउंड की गिनती तक लगातार पीछे बनी रही। भाजपा प्रत्याशी कमलेश शाह अपनी पोलिंग भी हार गए, लेकिन लास्ट के तीन चरणों में अचानक उन्हें फिर बढ़त मिलने लगी। 18वें राउंड में कमलेश शाह ने कांग्रेस की लीड कम करने में कामयाब रहे और दो चरणों में 3027 वोटों की बढ़त बनाते हुए जीत दर्ज कर ली।

5 चुनाव में 11 बार जीती कांग्रेस

अरमवाड़ा विधानसभा कांग्रेस का मजबूत गढ़ रहा है। अब तक हुए 15 चुनावों में भाजपा महज 3 बार ही जीत पाई है। शेष 11 चुनाव कांग्रेस और 1 चुनाव में जनसंघ को जीत मिली है। उपचुनाव में बीजेपी ने 16 साल बाद जीती है। इससे पहले 2008 के विधानसभा चुनाव में भाजपा के प्रेमनारायण ठाकुर ने जीत दर्ज की थी।

2008 में जीते थे भाजपा के प्रेमनारायण

प्रेमनारायण ने गोणवाना गणतंत्र पार्टी के मनमोहन शाह बट्टी को 437 वोट से हराया था। कांग्रेस तीसरे स्थान पर रही। इस बार भी भाजपा की जीत में गोंगपा का अहम रोल माना जा रहा है। गोंगपा प्रत्याशी देवनराम भलावी को 28 हजार से ज्यादा वोट मिले हैं। कांग्रेस की रणनीतिक चूक व सीनियर नेताओं में समन्वय की कमी भी हार की बड़ी वजह है।

कमलनाथ और जीतू पटवारी पर उठेंगे सवाल

अमरवाड़ा उपचुनाव के रिजल्ट सरकार और विपक्षी कांग्रेस की सेहत पर बहुत असर नहीं डालने वाले, लेकिन रणनीतिक तौर पर इसका बड़ा महत्व है। भाजपा यह चुनाव हार जाती तो निश्चित ही कांग्रेस कार्यकर्ताओं का मनोबल बढ़ता। पीसीसी चीफ जीतू पटवारी की मुश्किलें कम होतीं, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। विरोधी खेमे के नेता फिर उनके नेतृत्व पर सवाल उठाएंगे। कमलनाथ जैसे अनुभवी नेता की रणनीतिक असफलता के तौर पर इसे देखा जा रहा है।


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