September 17, 2026 |

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CG News: छत्तीसगढ़ वक़्फ़ बोर्ड के अध्यक्ष डॉ. सलीम राज का बड़ा बयान, समान नागरिक संहिता की वकालत से बढ़ी बहस

Chhattisgarh News: छत्तीसगढ़ वक़्फ़ बोर्ड के अध्यक्ष डॉ. सलीम राज का हालिया बयान राजनीतिक और सामाजिक हलकों में चर्चा का विषय बन गया है।

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Chhattisgarh News: रायपुर। छत्तीसगढ़ वक़्फ़ बोर्ड के अध्यक्ष डॉ. सलीम राज का हालिया बयान राजनीतिक और सामाजिक हलकों में चर्चा का विषय बन गया है। उन्होंने ‘समान नागरिक संहिता’ (Uniform Civil Code – UCC) का समर्थन करते हुए कहा कि भारत जैसे लोकतांत्रिक देश में सभी नागरिकों के लिए एक समान कानून होना चाहिए। उनके इस बयान को खास तौर पर इसलिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि यह मुस्लिम पर्सनल लॉ से जुड़े मुद्दों पर सीधे टिप्पणी करता है।

कानूनी समानता पर जोर

डॉ. सलीम राज ने कहा कि देश में धर्म के आधार पर अलग-अलग पर्सनल लॉ की व्यवस्था लंबे समय से चली आ रही है, लेकिन अब समय आ गया है कि नागरिक मामलों में भी समानता सुनिश्चित की जाए। उनका मानना है कि विवाह, तलाक और संपत्ति जैसे मामलों में अलग-अलग कानून सामाजिक असमानता और भ्रम की स्थिति पैदा करते हैं।

उन्होंने “एक देश, एक संविधान” की अवधारणा का समर्थन करते हुए कहा कि देश का कानून किसी भी धार्मिक परंपरा या रीति-रिवाज से ऊपर होना चाहिए। उनके अनुसार, जब आपराधिक कानून पूरे देश में समान रूप से लागू होता है, तो नागरिक कानून भी एकसमान होना चाहिए।

मुस्लिम पर्सनल लॉ पर टिप्पणी

वर्तमान में मुस्लिम समुदाय के विवाह, तलाक (जैसे इद्दत, हलाला) और विरासत से जुड़े मामलों का निपटारा मुस्लिम पर्सनल लॉ (शरियत) एप्लीकेशन एक्ट, 1937 के तहत होता है। डॉ. राज ने संकेत दिया कि इन रीति-रिवाजों को कानूनी रूप से अनिवार्य मानने पर पुनर्विचार की आवश्यकता है।

उन्होंने कहा कि संविधान की मूल भावना समानता और न्याय है, और किसी भी नागरिक के साथ कानून के स्तर पर भेदभाव नहीं होना चाहिए।

राजनीतिक और सामाजिक प्रभाव

डॉ. सलीम राज का बयान ऐसे समय आया है जब देशभर में समान नागरिक संहिता को लेकर बहस तेज है। उनके इस रुख को UCC के समर्थन के रूप में देखा जा रहा है, जिससे राजनीतिक गलियारों में भी हलचल बढ़ सकती है।

विशेषज्ञों का मानना है कि एक संवैधानिक पद पर बैठे व्यक्ति द्वारा इस तरह का बयान समाज में व्यापक चर्चा को जन्म दे सकता है। जहां कुछ लोग इसे प्रगतिशील कदम बता रहे हैं, वहीं कुछ वर्ग इसे धार्मिक स्वतंत्रता के अधिकार से जोड़कर देख रहे हैं।

आगे क्या?

डॉ. सलीम राज के इस बयान के बाद यह देखना दिलचस्प होगा कि राज्य और राष्ट्रीय स्तर पर राजनीतिक दल तथा सामाजिक संगठन किस प्रकार प्रतिक्रिया देते हैं। समान नागरिक संहिता का मुद्दा लंबे समय से देश की राजनीति और संवैधानिक विमर्श का हिस्सा रहा है, और यह बयान उस बहस को एक बार फिर केंद्र में ले आया है।


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